अश्वगंधा की खेती (Ashwagandha Cultivation) कैसे शुरू करें।

Ashwagandha Cultivation यानिकी अश्वगंधा की खेती पर बात करना इसलिए जरुरी हो जाता है, क्योंकि यह एक प्राचीन पौंधा है। जिसका वैज्ञानिक नाम विथानिया सोम्निफेरा है, और इसे भारत में एक बेहद महत्वपूर्ण और गुणकारी पौंधे के तौर पर जाना जाता है।

वह इसलिए क्योंकि इसका इस्तेमाल प्राचीनकाल से ही यूनानी और आयुर्वेदिक औषधियाँ बनाने के लिए किया जा रहा है। अश्वगंधा का पौधा लगभग 1.5 मीटर तक की ऊँचाई तक बढ़ सकता है, शुष्क और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के लिए अश्वगंधा की खेती यानिकी Ashwagandha Cultivation करना उपयुक्त रहता है।

इसकी प्रजाति सूखे और उपोष्णकटिबंधीय के अनुकूल होने के कारण भारत के कई हिस्सों में इसकी खेती एकाधिकार के तौर पर की जाती है, क्योंकि उन्हें पता होता है की इस प्रकार की यह खेती अन्य हिस्सों में होना संभावित नहीं है। भारत में आम तौर पर राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश अश्वगंधा के प्रमुख उत्पादक राज्यों में शामिल हैं।

अश्वगंधा की खेती भारत के किसानों को कितना कमा कर दे सकती है उसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं, की भारत में अश्वगंधा के जड़ों की वार्षिक आवश्यकता लगभग 7000 टन है, जबकि अनुमानित उत्पादन केवल 1500 टन है । हालांकि अकेले मध्य प्रदेश में 5000 हेक्टेयर से भी अधिक भूमि में Ashwagandha Cultivation किया जाता है, लेकिन यह इसकी माँग के मुकाबले काफी कम है ।

Ashwagandha Cultivation in India

जिन राज्यों का जिक्र हमने उपर्युक्त वाक्य में किया हुआ है, यदि आप उनमें से किसी राज्य से हैं। और अपनी खेती से अधिक कमाई होने वाली फसल को उगाने का विचार कर रहे हैं। तो ऐसे में अश्वगंधा की खेती पर विचार करना उपयुक्त हो सकता है। क्योंकि अश्वगंधा की जड़ों की माँग भारत में बहुत अधिक है बल्कि सप्लाई उसके आधे से भी कम है ।

इसलिए आगे हम इस लेख में अश्वगंधा के औषधीय उपयोग, खेती के लिए उपयुक्त मिटटी, उपयुक्त जलवायु, अश्वगंधा की किश्में, अश्वगंधा की खेती के लिए खेत को कैसे तैयार करना होता है। इत्यादि बिन्दुओं पर जानकारी देने का प्रयास कर रहे हैं।

अश्वगंधा के औषधीय गुण और उपयोग    

Ashwagandha Cultivation करने की सोच रहे किसान या उद्यमी इसके औषधीय उपयोग के बारे में जानना चाहते हैं, ताकि वे आश्वस्त हो सकें की बाजार में अश्वगंधा की माँग व्याप्त है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्यति में अश्वगंधा को सबसे अधिक प्रभावी कायाकल्प एजेंटो में से एक माना जाता है।

इसका सिर्फ जड़ का ही नहीं बल्कि बीज और पत्तियों का इस्तेमाल भी पारम्परिक चिकित्सा जैसे यूनानी और आयुर्वेद में प्राचीनकाल से होता हुआ आया है । और आज भी यूनानी और आयुर्वेद औषधियाँ बनाने के लिए अश्वगंधा का इस्तेमाल किया जाता है। यद्यपि इसकी जड़ों, बीज और पत्तियों का इस्तेमाल अलग अलग विकारों की औषधियाँ बनाने के लिए किया जाता है। 

अश्वगंधा की जड़ का इस्तेमाल आमवाती दर्द, जोड़ों की सूजन, तंत्रिका संबंधी विकार और मिर्गी की औषधियाँ बनाने में किया जाता है। पत्तियों का इस्तेमाल सूजन की औषधि और रस का इस्तेमाल आई ड्राप इत्यादि बनाने के लिए किया जाता है। इसकी छाल का इस्तेमाल भी काढ़ा इत्यादि बनाने के लिए किया जाता है, जो अस्थमा से ग्रसित मरीजों के लिए फायदेमंद होता है।

इसके अलावा इसकी सूखी जड़ों का इस्तेमाल हिचकी, सर्दी, खांसी, स्त्री विकारों के लिए टॉनिक बनाने में किया जाता है। अश्वगंधा और इसके अर्क का इस्तेमाल हर्बल चाय, पाउडर, टैबलेट और सिरप बनाने में भी किया जाता है। इसलिए वर्तमान में अश्वगंधा की खेती करना बेहद लाभकारी सिद्ध हो सकता है।

अश्वगंधा की खेती के लिए जलवायु और मिटटी   

भारत में अश्वगंधा की खेती खरीफ की फसल के तौर पर की जाती है, इस तरह की कहती के लिए ऐसे क्षेत्र जहाँ 500 से 750 मिमी वर्षा होती हो और जो अर्ध-उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के तहत आते हों, उपयुक्त होते हैं । लेकिन यदि सर्दी में इस फसल को एक या दो बारीश मिल जाती है तो इसकी जड़ों के विकास में काफी सुधार होता है।

लेकिन जब अश्वगंधा की फसल बढ़ रही होती है , तब उसे शुष्क मौसम की आवश्यकता होती है, इसलिए जब बारीश का मौसम समाप्त होने वाला होता है तब Ashwagandha Cultivation शुरू किया जाता है ।  

अश्वगंधा के पौंधे 200C से 380C का तापमान सहन करने की क्षमता रखते हैं हालांकि ये कम से कम 100C का तापमान भी सहन कर सकते हैं । इस तरह की खेती समुद्र तल से 1500 मीटर की ऊंचाई तक के क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती है । जहाँ तक अश्वगंधा की खेती के लिए उपयुक्त मिटटी का सवाल है, इसके लिए 7.5 से 8.0 पीएच तक की रेतीली दोमट मिटटी उपयुक्त रहती है, लेकिन हल्की लाल मिटटी, काली मिटटी इत्यादि में भी यह फसल अच्छी होती है।

अश्वगंधा की किस्में

यद्यपि भारत में भी अश्वगंधा की कई किस्में उपलब्ध हैं, लेकिन हाल ही में मध्य प्रदेश में स्थित जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय ने एक अच्छी किस्म का पता लगाया है। और अश्वगंधा की इस किस्म का नाम भीजवाहर ही रखा गया है, यह किस्म उच्च घनत्व में रोपने के लिए सबसे उपयुक्त किस्म मानी गई है।

जवाहर नामक अश्वगंधा की इस किस्म की फसल 180 दिनों यानिकी लगभग छह महीनों में पूर्ण हो जाती है और इस फसल से उत्पादित अश्वगंधा की सूखी जड़ों में विथेनाओलाइड्स की मात्रा 0.30% तक होती है।

अश्वगंधा की खेती के लिए नर्सरी तैयार करना   

Ashwagandha Cultivation के लिए बीज को सीधे खेतों में नहीं बोया जाता है, बल्कि जिस तरह से प्याज की खेती की जाती है ठीक उसी तरह अश्वगंधा के बीजों से पौंधे उगाने के लिए नर्सरी तैयार की जाती है। और फिर उन पौंधों को उस खेत में लगाया जाता है, जहाँ अश्वगंधा की खेती करनी हो। इस तरह के पौंधे उगाने हेतु नर्सरी या क्यारी बनाने के लिए रेत और खाद को अच्छी तरह से मिलाया जाता है, उसके बाद इनकी क्यारी तैयार की जाती है।

इन क्यारियों में बीजों की बुआई मानसून से ठीक पहले की जाती है, यदि आपको एक हेक्टेयर भूमि में अश्वगंधा की खेती करनी है, तो उसके लिए 7-9 किलो बीज की नर्सरी तैयार करनी होगी। क्यारियों में बीज डालने के 5-7 दिनों के अन्दर इनमें अंकुर आना शुरू हो जाते हैं। और जब पौंधे लगभग 35 दिन के हो जाते हैं तो इन्हें मुख्य खेत में रोपाई विधि से लगाया जाता है।

खेत की तैयारी और पौंधों का रोपण  

अश्वगंधा की खेती के लिए खेत तैयार करने के लिए खेत को बारीश से पहले 2/3 जुताई करके डिस्किंग या हैरोइंग कर ली जाती है। भूमि को अच्छी तरह जोतकर मिटटी को चूर्ण करके 10-20 टन खाद डाली जाती है, और फिर उस खेत को समतल कर दिया जाता है।

जहाँ तक पौंधों के रोपण का सवाल है इनकी रोपाई के लिए 60CM की दूरी पर मेड़ियाँ तैयार कर ली जाती हैं। हालांकि कुछ स्थानों पर 60 cm तो कहीं पर 30cm तो कहीं पर 45cm की दूरी पर भी पौंधे लगाये जाते हैं। लेकिन एक आंकड़े के मुताबिक प्रति हेक्टेयर भूमि में लगभग 55000 पौंधे 60 सेमी x 30 सेमी की दूरी का अनुपालन करके लगाये जा सकते हैं।

बीज दर, उपचार और बुवाई की विधि

अश्वगंधा की खेती अलग अलग विधियों से की जाती है, प्रसारण विधि की यदि हम बात करें  तो इसमें प्रति हेक्टेयर 10-12 किलो बीज पर्याप्त रहता है। अश्वगंधा के बीजों को लाइन में भी बोया जा सकता है यह विधि जड़ों के उत्पादन में अहम् योगदान देती है, इसलिए इस विधि को Ashwagandha Cultivation में प्राथमिकता दी जाती है। चाहे प्रसारण विधि का इस्तेमाल हो , या लाइन विधि का दोनों ही विधियों में बीजों को 1-3 सेमी की गहराई में बोना होता है, और उसके बाद हल्की मिटटी से ढकना भी होता है ।

जहाँ पौंधे से पौंधे की दूरी लगभग 8-10 सेमी होनी चाहिए वहीँ लाइन से लाइन की दूरी 20-25 सेमी उपयुक्त होती है। यद्यपि यह दूरी मिटटी की उपजाऊ क्षमता के आधार पर बढ़ाई भी जा सकती है।

बीजों को कई तरह के रोगों से बचाने के लिए थायरम या डाइथेन एम45 का इस्तेमाल प्रति किलोग्राम में 3 ग्राम की दर से किया जा सकता है यानिकी 10 किलो बीज में 30 ग्राम थायरम या डाइथेन एम45 इस्तेमाल में लाया जा सकता है। थायरम या डाइथेन एम45 में बीज को बुवाई से पहले उपचारित किया जाता है।  

Ashwgandha Cultivation के लिए निराई गुड़ाई

प्रसारण विधि से या पंक्तियों में लाइन विधि के माध्यम से उगाए गए पौंधों को उनकी बुवाई के 25-30 दिनों के भीतर इस तरह से प्रबंधित करना होता है, की प्रति स्क्वायर मीटर में 30 से 60 पौधे से अधिक न हों, यदि ऐसा हुआ तो आपको उन अतिरिक्त पौंधों को हाथ से उखाड़कर कहीं और स्थान पर रोपित करना होता है।

रोपण विधि में इस बात का ध्यान पहले ही रखा जाता है। पौंधों को खरपतवार इत्यादि से मुक्त रखने के लिए बुवाई के 20-25 दिनों के भीतर पहली निराई और इसके यानिकी पहली निराई के 20-25 दिनों बाद दूसरी निराई करनी चाहिए।

अश्वगंधा की खेती के लिए खाद पानी  

हालांकि Ashwagandha Cultivation के लिए भारी मात्रा में खाद या उर्वरकों की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन उत्पादन बढ़ाने के लिए आपको खाद का इस्तेमाल करना ही पड़ता है, वैसे अश्वगंधा की खेती के लिए जैविक खाद ही सबसे उपयुक्त होती है, इसलिए इसमें प्रति हेक्टेयर 10 टन एफवाईएम / 1 टन वर्मीकम्पोस्ट डालने की सलाह दी जाती है ।

उत्पादन को और अधिक बढ़ाने के लिए प्रति हेक्टेयर भूमि में 15 किलो नाइट्रोजन और 15 किलो फॉस्फोरस का भी प्रयोग किया जा सकता है। जहाँ तक सिंचाई या पानी की बात है तो अश्वगंधा की खेती के लिए ज्यादा बारीश या सिंचाई नुकसानदायक होती है।

पौंधों की रोपाई में के बाद उनकी जड़ों में पानी की हल्की बौछारें उन्हें जमीन में स्थापित होने में मदद करती हैं। अगर पौंधे सूखने लग जाएँ तो उनमें उनके प्राण बचाने के लिए सिंचाई की जा सकती है, वैसे इस फसल को बहुत ज्यादा पानी देने की आवश्यकता नहीं होती है ।

अश्वगंधा में लगने वाले कीट और रोग       

इस तरह की फसल पर कोई गंभीर रोग अभी तक नहीं देखे गए हैं लेकिन सीडलिंग रॉक एंड ब्लाइट जैसे रोग इस फसल को नुकसान पहुँचाते हुए देखे गए हैं। जहाँ नमी और बहुत अधिक तापमान हो वहां पर बीज से अंकुर हुए पौंधों की समाप्त होने की संभावना अधिक है।

लेकिन इस प्रकार की समस्या को पूर्व में बताये गए उपचार जिसमें रोगमुक्त बीजों का इस्तेमाल शामिल है रोक सकता है। बुवाई के समय 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से Carbofuran  का इस्तेमाल किया जा सकता है, नीम के केक का भी इस्तेमाल किया जा सकता है ।

अश्वगंधा की फसल को जब भी कीटों से कोई नुकसान हो तो 0.6% की दर से रोगोर या नुवन का छिड़काव किया जा सकता है । इसके अलावा 10-15 दिनों के अन्तर पर 0.5% मैलाथियान और 0.3% केल्थेन का मिश्रण का भी छिड़काव अश्वगंधा की खेती में किया जा सकता है ।

फसल की कटाई कब करनी चाहिए

फसल पूरी तरह काटने योग्य हो गई है उसका अंदाजा पत्तियों के सूखने और पीले लाल बेरी से लगाया जाता है। यानिकी जब अश्वगंधा के पत्ते सूखने लगते हैं और बेरी लाल पीले होने लगते हैं तो समझ लेना चाहिए की फसल काटने के लिए तैयार हो चुकी है। अश्वगंधा की खेती में जड़े भी महत्वपूर्ण होती हैं इसलिए इन्हें इनकी बुवाई के 150 से 180 दिनों के बीच फरबरी से मार्च महीनों में खुदाई करके काटा जाता है।

ध्यान रहे जब जड़ों की खुदाई की जा रही हो तो मिटटी में नमी होनी चाहिए, खुदाई के लिए हल या पॉवर टिलर का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जड़ इस फसल का महत्वपूर्ण उत्पाद है इसलिए इसे सावधानी से बाहर निकाला जाना चाहिए।

उसके बाद भी अश्वगंधा के विभिन्न हिस्सों जैसे जड़, बीज, पत्तों इत्यादि को अलग अलग करने की आवश्यकता होती है । लेकिन खुदाई से पहले तने को जड़ से 1 -2 सेमी ऊपर से काटकर जड़ों को इससे अलग कर लिया जाता है। और जब जड़ों की खुदाई कर ली जाती है तो फिर इन्हें अच्छी तरह धोकर छोटे छोटे टुकड़े करके धूप में सुखाया जाता है। जड़ों की लम्बाई, मोटाई के हिसाब से इन्हें अलग अलग ग्रेडों में विभाजित कर दिया जाता है ।

अश्वगंधा की खेती से सबसे अच्छी कीमत वाले उत्पाद में मजबूत और लम्बी जड़ आती है, जिसकी कीमत अच्छी मिल जाती है । इन जड़ों को नमी और कवक से बचाने के लिए टिन के कंटेनर में स्टोर करके रखा जा सकता है। अश्वगंधा के बेरीज को भी तोड़कर अलग कर लिया जाता है, और इनसे बीज निकालने के लिए इन्हें सुखाकर अच्छी तरह कुचला जाता है। अब बात आती है अश्वगंधा की खेती से कितना उत्पादन होता है।

तो एक आंकड़े के मुताबिक 1 हेक्टेयर भूमि से लगभग 3-5 क्विंटल सूखी जड़ें और 50 से 75 किलोग्राम बीज का उत्पादन होता है। हालांकि कुछ मामलों में यह उत्पादन 1 टन जड़ तक भी पहुँच जाता है।

अश्वगंधा की जड़ों को कहाँ बेचें

वैसे जहाँ भी आप Ashwagandha Cultivation कर रहे हैं, सबसे पहले वहीँ के स्थानीय बाजार में इसे बेचने के लिए अवसर तलाशें। लेकिन यदि स्थानीय बाजार में आपका उत्पाद नहीं बिक पा रहा है तो मध्य प्रदेश में नीमच और मंदसौर दो ऐसे बाजार हैं जो अश्वगंधा के लिए भारत में ही नहीं अपितु दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। यही कारण है की इन बाज़ारों में बाहर देशों से भी आयातक अश्वगंधा खरीदने के लिए आते रहते हैं।

इसके अलावा घरेलु बाजार में भी प्रोसेसर, पारंपरिक चिकित्सक, आयुर्वेदिक और सिद्ध औषधि निर्माता अश्वगंधा की जड़ों को बड़ी मात्रा में खरीदते हैं । घरेलु बाजार में भी अश्वगंधा की जड़ों को आसानी से बेचा जा सकता है क्योंकि इनका उत्पादन इनकी मांग के मुकाबले काफी कम है।

प्रशिक्षण या अश्वगंधा की खेती पर जानकारी हेती कहाँ संपर्क करें   

अश्वगंधा की खेती पर और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए और प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के बारे में जानने के लिए आप देश भर में उपलब्ध विभिन्न संस्थान एवं संगठनों से संपर्क कर सकते हैं। जिनमें से कुछ प्रमुख संस्थान और संगठनों की लिस्ट निम्नवत है।

  • भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत नेशनल मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड आईएसएम और एच विभाग।
  • लखनऊ, उत्तर प्रदेश में स्थित सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिसिनल एंड एरोमेटिक प्लांट्स।
  • जम्मू तावी में स्थित रीजनल रिसर्च लेबोरेटरी।
  • मध्य प्रदेश, इंदौर में स्थित कृषि महाविद्यालय ।
  • इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में स्थित उत्थान सतत विकास एवं गरीबी उन्मूलन केंद्र।
  • राज्यों में स्थित कृषि विश्वविद्यालय जैसे जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश।
  • आनंद, गुजरात में स्थित नेशनल रिसर्च सेण्टर फॉर मेडिसिनल एंड एरोमेटिक प्लांट्स।        

 Ashwagandha Cultivation यानिकी अश्वगंधा की खेती भले ही उत्तर भारत के कई राज्यों में की जा रही हो, लेकिन आज भी अश्वगंधा की जड़ों का उत्पादन इसकी माँग के अनुकूल नहीं हो रहा है। यही कारण है की लोग या औषधि बनाने वाली विभिन्न कम्पनियाँ अश्वगंधा को ऊँची कीमतों पर खरीदने को भी तैयार बैठी हैं। यदि आप भी किसी लाभकारी फसल की खेती करने का विचार कर रहे हैं, तो आप  अश्वगंधा की खेती शुरू करने पर भी विचार कर सकते हैं।

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